लेखक: राहुल सिंह, एडवोकेट (दिल्ली उच्च न्यायालय)

संपत्ति विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी चल या अचल संपत्ति को किसी लंबित वाद (Pending Suit) के दौरान कानूनी रूप से खरीदता है, तो वह उस मुकदमे में पक्षकार (Party) बनने का पूर्ण अधिकार रखता है। सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 9049/2026 (रसीलाबेन और अन्य बनाम दिनेश देवमल हरानी व अन्य) में यह फैसला सुनाते हुए निचली अदालतों के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें खरीदारों को प्रतिवादी के रूप में जोड़ने से मना कर दिया गया था।
इस मामले में वादी (Plaintiff) ने प्लॉट संख्या 63 के 2000 वर्ग फीट हिस्से पर खुद को किराएदार घोषित करने और बिना किसी बाधा के वहां अपने कब्जे का आनंद लेने के लिए एक सिविल वाद दायर किया था। इसके साथ ही, उसने स्थायी रोक (Permanent Injunction) की भी मांग की थी।
मुकदमे की कार्यवाही के दौरान ही, 23 अगस्त 2002 को अपीलकर्ताओं (रसीलाबेन व अन्य) ने मूल मालिकों से एक रजिस्टर्ड सेल डीड़ (Registered Sale Deed) के माध्यम से उस संपत्ति को खरीद लिया। संपत्ति खरीदने के बाद, अपीलकर्ताओं ने मुकदमे में खुद को प्रतिवादी (Defendant) के रूप में जोड़ने के लिए आवेदन दिया।
सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण निर्णय से संपत्ति विवादों से जूझ रहे खरीदारों के अधिकारों को एक नई मजबूती मिली है। इस फैसले ने यह स्थापित कर दिया है कि यदि किसी संपत्ति पर मुकदमा चल रहा है और कोई व्यक्ति उसे कानूनी रूप से खरीदता है, तो वह अपने कानूनी हितों की रक्षा के लिए उस मुकदमे में पक्षकार बनने का पूरा हकदार है। यह फैसला भविष्य में प्रॉपर्टी लिटिगेशन (Property Litigation) से जुड़े मामलों में एक मजबूत कानूनी मिसाल के रूप में काम करेगा।
*(यह लेख केवल कानूनी जानकारी और जनहित के उद्देश्य से साझा किया गया है। अपने किसी भी मामले में विशिष्ट विधिक परामर्श के लिए संबंधित अधिवक्ता से संपर्क करें।)